ईरान के पास तैनात रहेगी अमेरिकी सेना
पश्चिम एशिया में शांति की उम्मीदों को एक बार फिर बड़ा झटका लगा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार, 8 अप्रैल, 2026 को स्पष्ट कर दिया है कि जब तक ईरान पूरी तरह से समझौते की शर्तों का पालन नहीं करता, तब तक अमेरिकी सेना, युद्धपोत और विमान ईरान की सीमाओं के पास तैनात रहेंगे। ट्रंप ने ‘ट्रुथ सोशल’ पर जारी एक पोस्ट में चेतावनी दी कि यदि ईरान ने समझौते से छेड़छाड़ की, तो उसे “विनाशकारी परिणाम” भुगतने होंगे।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब लेबनान पर इजरायल के भीषण हमलों के बाद पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुआ ‘युद्धविराम’ टूटने की कगार पर है।
लेबनान में तबाही: ‘ऑपरेशन इटरनल डार्कनेस’
इजरायल द्वारा लेबनान में चलाए गए ‘ऑपरेशन इटरनल डार्कनेस’ में बुधवार को करीब 254 लोग मारे गए और 1,100 से अधिक घायल हुए। लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, यह 2026 के युद्ध का सबसे खूनी दिन रहा। इन हमलों के विरोध में ईरान ने धमकी दी है कि वह युद्धविराम से पीछे हट सकता है। ईरान का तर्क है कि लेबनान पर हमले बंद करना समझौते का हिस्सा था, जिसे अमेरिका और इजरायल ने सिरे से खारिज कर दिया है।
पाकिस्तान की मध्यस्थता और विवाद
पाकिस्तानी सेना प्रमुख असीम मुनीर और अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के बीच हुई बातचीत के बाद इस 14-दिवसीय युद्धविराम पर सहमति बनी थी। समझौते के मुख्य बिंदु निम्नलिखित थे:
-
हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य: वैश्विक तेल आपूर्ति बहाल करने के लिए इस मार्ग को खोलना।
-
परमाणु कार्यक्रम: ईरान द्वारा यूरेनियम संवर्धन (Enrichment) पर रोक लगाना।
-
सैन्य वापसी (शर्तों के साथ): ईरान की मांग है कि अमेरिका क्षेत्र से अपनी सेनाएं हटाए।
हालांकि, ट्रंप ने साफ कर दिया है कि अमेरिकी सेना तब तक वहां से नहीं हटेगी जब तक “असली समझौते” का पूर्ण पालन नहीं हो जाता।
सैन्य तैनाती और ‘घातक प्रहार’ की तैयारी
क्षेत्र में अमेरिका के दो विमानवाहक पोत (Aircraft Carriers) और भारी मात्रा में गोला-बारूद तैनात है। ट्रंप ने अपनी पोस्ट में कहा कि यह तैनाती “पहले से ही कमजोर हो चुके दुश्मन” के विनाश के लिए पर्याप्त है। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की यह रणनीति ईरान पर अधिकतम दबाव (Maximum Pressure) बनाए रखने की है ताकि वह हॉर्मुज़ मार्ग को दोबारा बंद न कर सके।
9 अप्रैल को असम चुनाव के पहले चरण के मतदान के बीच, वैश्विक स्तर पर यह तनाव भारत के लिए भी चिंता का विषय है, क्योंकि तेल की कीमतों में अस्थिरता भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है। अब सबकी नजरें शुक्रवार को इस्लामाबाद में होने वाली उच्च स्तरीय वार्ता पर टिकी हैं, जहाँ जेडी वेंस और ईरानी प्रतिनिधिमंडल इस नाजुक शांति को बचाने की कोशिश करेंगे।
